Rented Room

a filled dark room with a poster and a quote written on it
While changing address, I looked at my old room for the last time,
I didn’t remember exactly when I came here and made it mine,
This room saw me grow,
It witnessed my high and low,
I had spread my world in this few hundred square feet place,
I cleaned it, maintained it, decorated it in refined taste,

It saw me and friends bursting in laughter,
It also looked at me when I was lonely and no one was there,
These walls heard my wishpers;
my late night conversations with the girl I loved,
Then it also stood silently
when my heart was broken and battered,

This was a rented address but it was my home,
It wouldn’t remember me, it would belong to someone else once I am gone,
As I stepped into the cab for my new address,
A thought came to me, which should be said,
Life is nothing but a rented room, you can’t have it forever,
So don’t get too attached to it, in the end, nothing matters…
-N2S
13072015

मंज़िल से पहले (Manjil Se Pehle)

a boy looking at the sea appearing thoughtful

थी जो आग मुझमे,
जलती थी जो मेरे अंदर,
वजह थी वह हर खुशी की,
हर सपना उससे जगमगाता था,
कहती थी हसरत, कुछ हसीन है मंज़िल मेरी,
कुछ अलग सी तकदीर है मेरी,

उस मोड़ से दूर कहीं एक राह बहुत लंबी है,
जहाँ है थोड़ी यादें, लम्हों की कमी है,
डर लगता है की ये आग बीच राह में ही बुझ ना जाए,
जीतने की ये हसरत कहीं ऐसे ही सुख ना जाए,
हर बीता हुआ दिन कुछ और साँसे खर्च कर जाता है,
कुछ चेहरे, कुछ शिकवे बेवजह दे जाता है,

कदम चलता हूँ हज़ार मगर पर क्यूँ वहीं खड़ा हूँ मैं,
जितना समझुँ में खुद को उतना उलझता जाता हूँ मैं,
आँखें बंद करूँ तो दम सा घुट जाता है,
पर खुली आँखों से भी अंधेरा दूर कहाँ जाता है,
कभी कोशिश करता हूँ किसी को हँसाने की,
पर ये सोचकर ही हँसी बिखर जाती है की यह कोशिश कितनी झूठी है,
जब खुद ही दम तोड़ चुके है अरमान,
तो फिर मंज़िल से क्यूँ ये दूरी है,

हर जाती हुई शाम मुझे मेरे सपनों से दूर कर देती है,
और हर सुबह मेरे हसीन सपनो को तोड़ देती है,
धीरे धीरे ये आग बुझने लगी है,
पर जब देखता हूँ तो मेरी कहानी अब भी अधूरी सी है,
और जैसे कुछ कहानियाँ अक्सर ख़त्म हो जाती है मंज़िल से पहले,
बस एक डर है कहीं ये आग ना बुझ जाए मेरे जलने से पहले…
-N2S
20012012

कितना कमाता हूँ मैं (Kitna Kamaata Hoon Main)

different types of bank notes
कदमों की रफ़्तार भले तेज़ नहीं पर,
सपनो पर भरोसा आज भी है,
कुछ दूर हूँ शुरूवात से मगर,
खुद पर यकीन आज भी है,
ग़लत ना होकर भी दुनिया के लिए क्यूँ ग़लत हूँ मैं,
उनको तो बस दिखता है नोटों का वजन, जिन पर कुछ हल्का हूँ मैं,
क्यूँ वो नहीं पूछते की कैसा हूँ मैं?
क्यूँ हर सवाल हँसकर पूछता है, की कितना कमाता हूँ मैं ?

सोचता था की चेहरे पढ़ने से औरो के दिलों को समझ जाउँगा,
क्यूँ है दुनिया ऐसी शायद किसी को समझा पाउँगा,
पर अब जो पढ़ सकता हूँ चेहरे तो बस ये जानता हूँ,
कोई नहीं देखता कितने कदम चला हूँ मैं,
सब ये देखते हैं, की कितना कमाता हूँ मैं,

एक दीवार चढ़ने पर लगी थी चोट मुझे,
उसके कुछ निशान रह गये थे,
लंगड़ा के चलता हूँ तो कोई ये नहीं पूछता की कैसे गिरा मैं,
सब को ये जानना है की कहाँ खड़ा हूँ मैं,
कभी सोचता था मिलेंगे दोस्त जो कहीं राह पर,
दिल की हर बात कहेंगे,
कुछ किससे पुराने, कुछ नये, साथ बैठ कर हँसेंगे,
पर कोई मिलने पर नहीं पूछता की, कैसा हूँ मैं,
सबको जानना है की कितना कमाता हूँ मैं,

मानता हूँ की इस दुनिया में एक इंसान की पहचान,
उसके उँचे औहदे से होती है,
जहाँ लोग बस देखते हैं कार की कीमत,
बातें हसियत से शुरू होती है,
क्यूँ सबको चाहिए ज़रूरत से ज़्यादा?
जब सबकी मंज़िल छे फीट ज़मीन है,
क्यूँ किसी के गिरने पर लोग खुश होते हैं?
और मिल जाए थोड़ी शोहरत तो जल उठते हैं,
क्यूँ नहीं समझते की आए थे खाली हाथ?
और साथ तो नाम भी नहीं जाएगा,

जब कहता हूँ की मैं बस अपने सपनो को जीना चाहता हूँ,
कर रहा हूँ कोशिश की उनको एक बार जी सकूँ,
किसी के सपनो को समझना तो दूर, लोग होठों को एक तरफ खींच लेते हैं,
कुछ तो हँसते है पीछे, कुछ तो मुँह पर ही हँस देते हैं,
क्या फ़र्क पड़ता है की मेरे पर्स में कुछ नोट कम है,
नहीं चाहिए मुझे सोने की थाली जब, मुझे भूख कम है,
चेहरे पर एक मुस्कान और दिल में इतनी तो गैरत है,
की ना पूछूँ किसी की हसियत जब तक उसमें हसरत है,

नहीं करता मैं उम्मीद सबसे भले की,
ये तो शायद बेमानी है,
पर बस एक मासूम सवाल है दोस्तों,
में तो कभी बदला नहीं,
फिर क्यूँ पूछते हो की कितना कमाता हूँ मैं?,
फिर क्यूँ पूछते हो की कितना…

-N2S
11022012

मुझसे मैं मिलूँ (Mujhse Main Miloon)

silhouette of a boy walking with a backpack against the horizon

मिला ही नहीं मैं किताबों के अक्षरों में,
ना था मैं शब्दों के शोर में,
और ना रिश्तों की बंदिशों में,
पता ही नहीं चला के ये सफ़र कब हुआ शुरू,
तो कहाँ मिलता मैं दुनिया के सच और झूठ में,

मिला नहीं मैं दोस्तों की भीड़ में,
ना ही छलका किसी की आँखों में,
ना ही सुकून मिला किसी की बाहों में,
कोशिश बहुत की ठहर के ढूँढूँ इन रास्तों पर,
मगर कहाँ मिलता यहाँ तो हर कोई खुद से कोसो दूर है,

सोचा शायद सुनसान सड़कों में मिलूँ खुद से,
शायद पहाड़ों की उँचाई से दिखूं,
बिका नहीं नोटों की खुश्बू से,
रुका नहीं कमजोर हसरतों की ज़ंजीरों से,
फिर भी ढूँढ ना पाया खुद को कहीं,

अब सोचता हूँ की शायद मैं तो यहाँ कभी था ही नहीं,
फिर भी एक आस लिए भटकता हूँ की क्या पता कहीं
किसी मोड़ पर
मुझसे मैं मिलूँ…

-N2S
21092012